The Lowly city of Bollywood चेतन आनंद की फिल्म ‘नीचा नगर’

‘नीचा नगर’ ( lowly city ) चेतन आनंद द्वारा निर्देशित पहली हिन्दी फिल्म थी । फिल्म अमीरों और गरीबों के बीच अवसरों के भेद और संसाधनों की विषमता को उजागर करती है। फिल्म की कहानी ख्वाजा अहमद अब्बास और हयातुल्लाह अंसारी ने लिखी है । इससे ठीक पहले ख्वाजा अहमद बंगाल के भीषण आकाल पर ‘धरती के लाल’ ( 1945 ) फिल्म लिख चुके थे । इस फिल्म से हिन्दी सिनेमा में उन यथार्थवादी फिल्मों का आगमन हुआ जिन्हें आप और हम ‘आर्ट या कला सिनेमा’ के नाम से जानते हैं।

आपमें से अधिकांश लोगों ने प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह  का नाम रेड कार्पेट पर अभिनेत्री ऐश्वर्या राय की चहलकदमी के संदर्भ में ही सुना होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं की चेतन आनंद की फिल्म ‘ नीचा नगर’ को 1946 में कान में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिल चुका है ! सिनेमा के उस सुनहरे दौर में जब मार्केटिंग की भाग-दौड़ नहीं थी यह एक ऐसी फिल्म थी जिसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर खूब सराहना मिली।

यह फिल्म मैक्सिम गोर्की के समाजवादी नाटक ‘द लोअर डेप्थ’ से प्रभावित थी । फिल्म समाजवादी यथार्थ की दृष्टि से बुनी गयी है । यह फिल्म वर्ग – संघर्ष को पूरी नग्नता के साथ उघाड़ती है और समाज को सोचने पर मजबूर करती है।

फिल्म में एक अमीर भूस्वामी है जिसे लोग सरकार कह कर बुलाते हैं। वह ऊंचा नगर में रहता है । ऊंचा नगर पहाड़ियों पर बसा है जहां शहर के तमाम रसूखदार लोग और बुद्धिजीवी रहते हैं। जबकि गरीब लोग तराई के इलाके में रहते हैं जिसे नीचा नगर के नाम से जाना जाता है । सरकार शहर के विकास को ढाल बनाकर पहाड़ों के एक नाले को नीचा नगर की ओर मोड़ देने का प्रस्ताव करते हैं। बलराज बस्ती का एक प्रबुद्द व्यक्ति है जो बाकी लोगों के साथ सरकार के इस फैसले का पुरजोर विरोध करता है।

सरकार जब एक तकरीर के दौरान बलराज को खामोश रहने के लिए कहता है तो बलराज जवाब देता है – ‘अब चुप रहने का जमाना गया’। यह बस्ती के लोगों द्वारा विद्रोह की शुरुआत है। लेकिन, बस्ती के कुछ लोग सरकार के हाथों बिक जाते हैं और अंततः शहर के विकास और नई इमारतें खड़ा करने के लिए नाले को नीचा नगर की तरफ मोड़ दिया जाता है। पानी के बहाव से उसमें दलदल भी मिल जाता है। गंदगी की वजह से पशु-पक्षी मरने लगते हैं । हद्द तो तब हो जाती है जब सरकार नल की मरम्मत के नाम पर नीचा नगर का पानी रुकवा देते हैं। बस्ती में साफ पानी का अभाव हो जाता है और बस्ती के लोग बीमार पड़ने लगते हैं।

उधर सरकार कहते हैं कि नाले की वजह से बीमारी नहीं फैल रही, बीमारियां तो आती-जाती रहती हैं, बीमारी की रोकथाम बस भगवान कर सकते हैं। बीमारी से लोगों को राहत दिलाने के लिए सरकार नीचा नगर में अस्पताल खुलवाने की मुनादी करवाते हैं।

बलराज की तरह ही बस्ती के हकीम याकूब चाचा भी बस्ती की आवाम के लिए फिक्रमंद होते हैं। चाचा लोगों को समझाते हैं कि – 

‘जब तक ये नाला है तब तक बीमारी है जब तक बीमारी है तब हम अस्पताल के मोहताज रहेंगे और यह अस्पताल चल रहा है उन इमारतों की आमदनी से जो नाला हटाकर बनी हैं।’ चाचा का यह कथन आम आदमी के खिलाफ सत्ता तंत्र की साजिश को पूरी नग्नता से उघाड़ता है ।याकूब चाचा सेवा आश्रम बनाने की बात कहते हैं। जहां बीमारों की देखभाल की जा सके। सब मिलकर तय करते हैं कि वे अस्पताल नहीं जाएंगे। लेकिन मरता क्या न करता ! जानलेवा बीमारी से त्रस्त बस्ती वाले अस्पताल जाने को मजबूर हैं। फ़िल्म गांधीवादी आदर्शों से भी प्रभावित है। आज सिनेमा के सौ साल पूरे हों जाने पर भी ऐसे कथानक पर कोई सुरुचिपूर्ण फ़िल्म मिल सकना दुर्लभ है।

बस्ती में रहने वाला सागर जो सरकार के हाथों की कठपुतली है लोगों को बलराज के खिलाफ भड़काता है। लेकिन जब उसकी प्रेयसी और बलराज की बहन रूपा बुखार और बीमारी से दम तोड़ देती है तब सागर का हृदय परिवर्तन होता है। बस्ती के लोगों के मन में यह बात घर कर जाती है कि ‘रूपा मर गई लेकिन अस्पताल नहीं गई’ जिसका सांकेतिक अर्थ है कि वह पूंजी और सत्ता के सामने नहीं झुकी। उसकी कुर्बानी का असर होता है। लोग वापस एकजुट होते हैं। बीमार लोग अस्पताल छोड़कर चले जाते हैं और खुलकर अस्पताल का बहिष्कार करते हैं। ऊंचा नगर के बुद्धिजीवी भी इस बात को अपना वैचारिक समर्थन देते हैं। वे नगरीय सुविधाओं का बहिष्कार करते हैं जिससे सरकार और ऊंचे रसूख के लोगों को आर्थिक नुकसान पहुंचता है। खुद सरकार की बेटी माया नीचा नगर के लिए कुछ नहीं कर सकने का पश्चाताप करती है और वह उनके संघर्ष में साथ खड़ी हो जाती है।

आज की स्थितियों पर एकदम सटीक फ़िल्म है। 2.0 जैसी लार्जर देन लाइफ फिल्म ‘नीचा नगर’ जैसे सिनेमा के समक्ष एक बचकानी हरकत लगती है।

नीचा नगर के माध्यम से प. रविशंकर ने पहली बार हिन्दी  सिनेमा के लिए संगीत दिया था । बाद में के. ए. अब्बास की ‘धरती के लाल’ के लिये भी उन्होंने ही संगीत दिया। फिल्म में ‘उठो की हमें वक़्त की गर्दिश ने पुकारा’ या ‘कब तक गहरी रात रहेगी, एक निराली सोच जगी है। अब झुकेंगे फिर नहीं’ जैसे सार्थक, परिवर्तनकामी और प्रगतिशील गीत हैं। ये गीत समाज की प्रतिध्वनि हैं यह जन संगीत है । नीचा नगर जनगीत की फ़िल्म है। आजादी से भी पहले इतनी दूरदर्शी फ़िल्म का विचार आना एक सुकून देता है ।

फ़िल्म का प्रिंट बेहद खराब है।आपको मेहनत करनी होगी फ़िल्म देखने के लिए लेकिन यकीन जानिए आप निराश नहीं होंगे। फिल्म का में कैमरा का काम कई दृश्यों में बेहद अच्छा है जिसका श्रेय कैमरामैन विद्यापति घोष को जाता है । फिल्म से इप्टा ( IPTA ) के सदस्य भी जुड़े रहे। अफसोस की बात है की इस फिल्म के लिए उस वक़्त डिस्ट्रीब्यूटर्स तक नहीं मिले।  ज़ोहरा सहगल ( भाभी की भूमिका ) की यह पहली फिल्म थी। ज़ोहरा जी ने ही इस फिल्म का नृत्य निर्देशन किया।

image credit Google

Matinee Box Desk

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