गुदगुदाहट से भरी हुई फिल्म है ‘बधाई हो’

जीवन के 50 बसन्त देख लेने के बाद जब आपको बच्चों की शादी की फिक्र होनी चाहिए उस वक़्त आप एक बार फिर खुद माता-पिता बनने वाले हों;  समाज में ऐसी स्थिति बहोतों के घर में आ जाती है लेकिन अमूमन शर्मिंदगी का सबब बनती है। यह उस परिवार के लिए मूल्यों का संकट भी है। निम्न वर्ग के पास फुर्सत नहीं है और उच्च वर्ग को जरूरत नहीं है कि वह सामाजिक मूल्यों के झोल में उलझे। लेकिन दिखावा कहें या मजबूरी मध्यम वर्ग खुद को इन मूल्यों से जोड़कर देखता है और इन्हें पोसता भी है। एक अधेड़ उम्र के जीवनसाथी और उनके परिवार को ऐसे में किन स्थितियों से जूझना पड़ता है यही ‘बधाई हो’ फ़िल्म की बुनावट है।


सुरेखा सीकरी (दादी) फ़िल्म की वास्तविक नायिका हैं। क्या उम्दा किरदार गढ़ा गया है उनका और उतना ही उम्दा उन्होंने निबाह भी किया है। नीना गुप्ता का अभिनय हमेशा की तरह सधा हुआ है लेकिन उनके किरदार को और निखारा जाना चाहिए था। पिता की भूमिका गजराज राव ने बखूबी निभाई है उनकी अदाकारी और टाइमिंग गजब की है। आयुष्मान और सान्या अपनी भूमिकाओं में अच्छे हैं।

पार्श्व संगीत और संवादों की तुकबन्दी कई जगह बहोत अच्छी है। कहीं-कहीं आपको मूक हास्य फिल्मों की रचनात्मकता महसूस होगी। फ़िल्म का संपादन हल्का लगा और इस वजह से निरन्तरता में कुछ कमी भी दिखी।  फ़िल्म एक दो जगह खटकी लेकिन कुल मिलाकर अच्छी है और देखी जानी चाहिए।


फिल्मों का अपना समाजशास्त्र होता है। लड़कियां किसी भी सामाजिक परिवर्तन की अधिक सहज वाहक होती हैं और इसे लेकर उनकी स्वीकार्यता भी अधिक है। आजकल के सिनेमा में इस बात को दिखाया जाना एक अच्छा संकेत है। युवाओं का एक वर्ग ऐसा है जो ‘फिल्मी टशन’ को सीधे व्यवहारिक जीवन में भी अपनाता है। ऐसे में कार के शीशों पर ‘KAUSHIK’S’ या अपनी सामाजिक-जातीय पहचान लिखना जैसी चीजों को लेकर फिल्मकार को संजीदा होना चाहिए। हमारे देश में जहां अमूमन युवा किसी सार्थक सोच का नहीं बल्कि भीड़ का प्रतिनिधित्व करते हुए अधिक दिखाई पड़ते हैं , वहां यथार्थ के चक्कर में ऐसे प्रयोगों से फिल्मकार को बचना चाहिए। 
आजकल की फिल्मों की एक और बात जो हमें पसन्द है वह है पति-पत्नी या जीवनसाथी से रिश्तों की खूबसूरती को दिखाया जाना।कितना सुखद महसूस होता है जब पुरुष साथी तमाम झंझावातों के बावजूद अपनी महिला साथी का हाथ थामें रहता है। प्रेम और परिवार दोनों का कुल हासिल यही है।


बहरहाल, जो विषय मूल रूप से समानांतर सिनेमा द्वारा उठाए जा रहे थे उन्हें मुख्यधारा का सिनेमा हल्के-फुल्के मोड में उठा रहा है। समानांतर सिनेमा अपनी प्रस्तुति में कितना ही सार्थक और उद्देश्यों में कितना ही समर्पित क्यों न रहा हो सच यह है कि वह आम आदमी का सिनेमा नहीं बन सका। छोटे स्तर पर ही सही सिनेमा की यह एक अच्छी किस्म है। बस एक बात जो खटकती है वह है परिवेश की सहजता और भाषा पर अधिकार (रिसर्च) की कमी।  एक सार्थक सिनेमा हमें अपने आस पास हो रही सामान्य सी दिखने वाली चीजों को देखने की बहुआयामी दृष्टि देता है। जब हम चीजों और व्यवहार को परखने की यह दृष्टि पा लेते हैं तब सिनेमा व्यावसायिक हो या समानांतर वह सफल होता है।

pic credit google

Matinee Box Desk

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