‘ओ वुमनिया अहा वुमनिया’ स्नेहा खानवलकर

दोस्तों  गैंग्स ऑफ वासेपुर का यह गीत अगर आप एक बार सुन लें तो इसका संगीत बहोत देर तलक आपके कानों में धनकता रहता है। इस शानदार गीत के पीछे बहुत दिलचस्प कहानी कहानी दिलचस्प कहानी कहानी है आपको मालूम होगा कि अनुराग कश्यप अपनी फिल्मों में नए लोगों को मौका भी देते हैं और एक्सपेरिमेंट करने की छूट भी। जब अनुराग ने ‘गैंग्स आफ वासेपुर’ प्लान की तो उन्होंने एकदम नई लड़की स्नेहा खानवलकर को इसका संगीत तैयार करने की जिम्मेदारी दी।

स्नेहा ने एकदम देसीपन की तलाश में पटना और बनारस की की गलियों की खूब ख़ाक छानी। दरअसल लोक धुनों के अलावा उन्हें गले में एक ख़ास किस्म की ख़राश चाहिए थी। गायिका भी ऐसी जो अधेड़ या मध्यम उम्र की हो ताकि आवाज़ में वह भारीपन और वह अनुभव झलके जो घरों में गाए जाने वाले गीतों में होता है। पटना में इस तरह की आवाज़ ढूंढने के लिए एक ऑडिशन रखा गया। ढूंढने से तो खुदा भी मिल जाता है तो आखिरकार स्नेहा को भी वह ख़राश मिली रेखा झा और खुशबू राज के रूप में।

स्नेहा जब भी बिहार गईं तो वहां के गली कूचों छोटे बड़े मोहल्लों में खूब घूमीं और वहां लोकल जानकारों की मदद से ऐसे लोगों को ढूंढा जिन्हें देसी गीतों की नब्ज़ मालूम थी जिन्हें जिन्हें मालूम थी जिन्हें जिन्हें नब्ज़ मालूम थी जिन्हें जिन्हें मालूम थी जिन्हें देसी इंस्ट्रूमेंट्स का मालूम था।

अब सुनाते हैं आपको स्नेहा के त्रिनिदाद पहुंचने की कहानी ? स्नेहा अपने एक इंटरव्यू में बताती हैं कि उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों में एक म्यूजिक डॉक्यूमेंट्री देखी जिसमें त्रिनिदाद में रहने वाले भारतीयों द्वारा बजाए जाने वाले संगीत का जिक्र था। वे इससे बहोत प्रभावित हुईं। मजेदार बात यह है कि त्रिनिदाद में बस गए हिंदुस्तानी बिहारी लोग अभी तक अपने गीतों में इन देसी इंस्ट्रुमेंट्स धनताल, ढोलक और हारमोनियम का इस्तेमाल करते हैं। बस फिर क्या था उन्होंने टिकिट बुक कराई और निकल पड़ीं त्रिनिदाद लोक संगीत की तलाश में। उनकी इस लगन का परिणाम ‘ओ वुमनिया’ गीत के रूप में आज हम सबके सामने है।

सिनेमा से जुड़े कलाकारों के इस जज़्बे को इस मेहनत को मैटिनी बॉक्स सलाम करता है। सिनेमा से जुडी हुई ऐसी ही दिलचस्प ख़बरों के लिये मैटिनी बॉक्स के साथ बने रहिये. 

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मैटिनी बॉक्स डेस्क

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