मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था, के वो रोक लेगी, मना लेगी मुझको

मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था, के वो रोक लेगी, मना लेगी मुझको

हवाओं में लहराता आता था दामन, के दामन पकड़कर बिठा लेगी मुझको।

कैफ़ी आज़मी का लिखा फ़िल्म हकीकत का यह गीत मासूम से दिखने वाले जिस नौजवान पर फिल्माया गया था वह थे अभिनेता सुधीर। उनका असली नाम भगवानदास मूलचंद लूथरिया था। उन्होंने लगभग 200 फिल्मों में काम किया और 70 से 90 के दशक की फिल्मों में बतौर विलेन अभिनय किया। उन्होंने कुछ कॉमिक रोल भी निभाए। उनका अंदाज़ बेहद निराला था। एक विलेन के तौर पर भारी मूछें, चमकदार कपड़े, घुंघराले बाल, अपने संवाद हाई पिच में बोलना और कुछ नाटकीय किस्म की वेशभूषा पहनना सुधीर साहब की खासियत थी। उन्होंने मजबूर, सत्ते पे सत्ता, शराबी, खोटे सिक्के, शान, मेरी जंग, हरे रामा हरे कृष्णा और 90 के दशक में बॉलीवुड के किंग शाहरुख खान के साथ ‘बादशाह’ जैसी फिल्मों को अपनी अदाकारी से सजाया। फिल्म ‘सत्ते पर सत्ता’ में सुधीर साहब ने अमिताभ बच्चन के भाई की भूमिका निभाई थी.

सुधीर जी के बारे में एक दिलचस्प बात आपको बताते हैं। सुधीर साहब को रेस का खूब शौक था और इत्तेफ़ाक़न वे अक्सर जीत भी जाते थे। उनके पास दौलत कि कोई कमी नहीं थी। लेकिन उनकी इस विरासत की देखभाल करने वाला भी कोई नहीं था। और इस बात का उन्हें बहोत दुख भी था कि उनके चले जाने के बाद आखिर कौन उनकी इस धन संपत्ति को संभालेगा । आखिरकार 12 मई 2014 को यह दिलचस्प अभिनेता एक लंबी बीमारी से जूझते हुए इस दुख को अपने सीनें में भरकर हम सबको छोड़कर चला गया।

मुझे रात दिन ये ख़याल है, वो नज़र से मुझको गिरा ना दे

मेरी ज़िंदगी का दिया कहीं, ये ग़मों की आँधी बुझा ना दे।

1961 की फ़िल्म ‘उम्र कैद’  के लिए हसरत जयपुरी का लिखा यह गीत सुधीर साहब पर ही फिल्माया गया था।

pics credit google

Matinee Box Desk

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